अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम उचित नहीं

  • uploaded on : 2016-11-05 14:11:47
 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम उचित नहीं
 

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की सरकारें अपना उचित विरोध भी सहन नहीं कर पाती हैं। एनडीटीवी मामला  इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। 
एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने इस आदेश को प्रेस की स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष उल्लंघन करार दिया है और इस तुगलकी आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी तथा अन्य नेताओं ने भी इसे अवैधानिक करार दिया है। टीवी चैनल ने जो देखा उसे जनता के सामने रखा और यह अनोखा चैनल नहीं है, बल्कि अन्य चैनलों ने भी इसका प्रसारण किया था। लेकिन भारत सरकार के चंपू चैनलों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्योंकि एनडीटीवी किसी का चंपू चैनल नहीं है, इसलिए उसका एक दिन का प्रसारण बंद करने का निर्णय दिया गया। 
मोदी जी, हमने आपातकाल देखा है और जेल भी काटी है। लेकिन उसके बाद समाचार पत्रों पर रोक लगाने का परिणाम क्या हुआ है, उसे आपको भूलना नहीं चाहिये। आपको ये याद रखना चाहिए कि इस देश में लोकतांत्रिक शासन है, जहां जनता मूक होकर घटनाएं देखती रहती है और आम चुनाव में उसका भरपूर जवाब देती है। आज कोई भी सरकार अपना विरोध सहन नहीं कर पाती है, जिसका उदाहरण राजस्थान में देखने को मिला। जहां पत्रिका जैसे समाचार पत्र के विज्ञापन मुख्यमंत्री ने रूकवा दिये, जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई के बाद जारी करवाया। उत्तर प्रदेश में आपके इस समाचार पत्र को भी एक भ्रष्ट अधिकारी की नाराजगी के परिणाम स्वरूप बंद कराने का प्रयास किया गया और उसका घोषणा पत्र रद्द कराया गया।
यहां भी माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के द्वारा ही 
समाचार पत्र चालू हो चुका है। आज भारत सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन देता है, जो भारत सरकार का चंपू है। मेरा यह सब लिखने का मतलब बस इतना है कि इस मौके पर भी यदि समाचार पत्र व चैनल अपने निजी हितों के कारण चुप रहे तो समाचार पत्रों का अस्तित्व तो समाप्त होगा ही, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश से लोकतंत्र का अस्तित्व भी धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगा और देश की तानाशाही का कष्ट भोगना पड़ेगा।