बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम में करोड़ों के वाहन घोटाले को पचा गए अधिकांश जिलों के डीएम, एनएचएम एमडी की रिपोर्ट को नकारा, न एफआईआर न वसूली

  • uploaded on : 2017-07-06 00:00:00
बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम में करोड़ों के वाहन घोटाले को पचा गए अधिकांश जिलों के डीएम, एनएचएम एमडी की रिपोर्ट को नकारा, न एफआईआर न वसूली
 

मनीष श्रीवास्तव लखनऊ। यूपी में पिछली सरकारों के दौरान हजारों करोड़ के घोटालों की कलंककथा लिखी गयी थी। इनमे से कई भ्रष्टाचार के मामले तो अब सीबीआई की चैखट तक भी पहुँच गए हैं लेकिन प्रदेश में उन योजनाओं में भी घोटालों की साजिश रची गयी थी जिनकी सीबीआई जांच तक चल रही है इनमे सबसे पहला नाम एनआरएचएम घोटाले का है।

जिसको अब एनएचएम योजना से सम्बोधित किया जाता है खासतौर पर करोड़ों के वाहन घोटाले को तो दबा ही दिया गया है। ये घोटाला बसपाई आईएएस व् तत्कालीन एमडी अमित घोष के एनएचएम एमडी रहते अंजाम दिया गया था। घोटाले में यूपी के अधिकांश सीएमओ समेत कई बड़े अफसरों की गर्दन फंसी हुई है। जिलों के डीएम ने घोटाले से ही इंकार कर दिया है। वहीं छोटे डाॅक्टरों के खिलाफ शासन ने विभागीय कार्रवाई शुरु की है।
मौजूदा एमडी आलोक कुमार ने एनएचएम के तहत करोड़ों का वाहन घोटाला पकड़ा था। लेकिन एक साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद घोटालेबाजों पर शिकंजा नहीं कस पाया।  जिलों के डीएम को बाकायदा दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए पत्र तक लिखा गया था। करोड़ों की वसूली के लिए भी लिखा। फिर भी आज तक कोई कार्रवाई और वसूली सिर्फ इसलिए नहीं की गयी क्योंकि इस घोटाले में सिर्फ सीएमओ ही नहीं जांच में डीएम तक फंसेंगे क्योंकि कई जिलों के टेंडरों में ही बड़ा फर्जीवाड़ा है और इसकी सीधी जिम्मेदारी डीएम की रहती है। 
इसलिए डीएम ने घोटाला होने से ही इंकार कर दिया। तत्कालीन मिशन डायरेक्टर अमित घोष के कार्यकाल के दौरान आखिर इस घोटाले को क्यों नहीं बेनकाब किया गया। इसके पीछे भी कई राज हैं।  ऐसे ही वाहन घोटाले में आईएएस प्रदीप शुक्ला को जेल की हवा खानी पड़ी थी
राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम अर्थात आरबीएसके के तहत प्रदेश के 820 ब्लाकों में दो-दो गाड़ियां लगाई गयी थीं, ताकि पंचायत स्तर तक जाकर बच्चों की सेहत जांची जा सके। 
महीने में 20 दिन डाॅक्टर ब्लाॅक में जातें हैं। लेकिन जब एनएचएम की आॅडिट टीम ने जांच की तो पता चला कि गाड़ियां ब्लाॅकों में गयी ही नहीं और भुगतान भी हो गया। परिवहन विभाग की वेबसाइट से गाड़ी के नंबर चेक कराए गए तो हर स्तर पर चैंकाने वाले तथ्य सामने आए। घोटालेबाजों ने एक ही वाहन कई ब्लाकों व जिलों में तो लगा ही रखे थे, नतीजतन एनएचएम के एमडी आलोक कुमार ने खुद जांच कराई तो करोड़ों के घोटाले की परतें उधड़ने लगी। 52 जिलों के 500 से अधिक ब्लाकों में गाड़ियां ही नहीं थीं और फर्जी नंबर दिखाकर भुगतान लिये जा रहे थे। स्कूटर, ट्रैक्टर ,एम्बुलेंस ट्रक और निजी वाहनों के नंबर पर दौड़ी गाड़ियों का भुगतान जिलों के अफसरों ने ले लिया था। सिर्फ यही नहीं जांच में साफ हुआ कि किराए पर टैक्सी के रूप में चलने वाले वाहनों के लिए अफसरों ने टेंडर तक नहीं किये थे। दो साल पुराने टेंडर पर ही वाहनों को दौड़ा दिया गया ताकि करोड़ों की खुली लूट को अंजाम दिया जा सके। 
बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत हुए करोड़ों के वाहन घोटाले को खुद जिलों के डीएम ने नकार दिया। इसका सीधा अर्थ है कि जिलों के डीएम घोटालेबाज अफसरों से मोटी रकम ले चुके हैं असला में एनएचएम एमडी की जांच टीम ने प्रारंभिक जांच में इस योजना के तहत करोड़ों का घोटाला उजागर किया और डीएम से रिपोर्ट मांगी थी लेकिन अधिकांश जिलों के डीएम ने घोटाले पर ही सवाल खड़े करते हुए अफसरों को क्लीनचिट दे डाली। 
यही नहीं एनएचएम एमडी आलोक कुमार ने 52 जिलों में हुए करोड़ों के वाहन घोटाले पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश जिलों के डीएम को दिए थे लेकिन एक भी जिले में एफआईआर आज तक दर्ज ही नहीं हुई। लम्बे समय बाद शासन ने कई डाॅक्टरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति तो की लेकिन इस सूची में अधिकांश सीएमओ की जगह सिर्फ सीएचसी और पीएचसी के ही छोटे डाॅक्टर शामिल है उद्धरण के तौर पर निष्पक्ष  प्रतिदिन के पास मौजूद सीतापुर जिले की सूचि के मुताबिक सीएचसी महमूदाबाद के तत्कालीन अधीक्षक डाॅ. समीर कुमार वर्मा, लहरपुर के डाॅ. दिनेश, एलिया सीतापुर डाॅ. संजय गौड़ मछरेटा के डाॅ.आनंद  मिश्रा परौदी के डाॅ. अमित कुमार सिंह, महोली के डाॅ. इमरान अली खान, पिसांवा के डाॅ.डीपी भारती सांडा के डाॅ. अनूप पांडेय गोंदलामऊ के डाॅ दिलशाद , बिस्वा के डाॅ. अमित बाजपेई तम्बौर के डाॅ. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव के खिलाफ शासन की स्वास्थ्य सचिव हेकाली झिमोमी ने विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं जांच अधिकारी लखनऊ मंडल की एडी को बनाया गया है जांच आख्या एक महीने में मांगी गयी है ये सारे आदेश पिछले माह मध्य में जारी हुए हैं इसी तरह अलग अलग जिलों में कार्रवाई हुई है लेकिन एफआईआर न करके घोटाले को दबा दिया गया है और न ही अभी तक घोटाले की धनराशि की वसूली हुई है घोटाले की साजिश में बड़े अफसरों की भूमिका भी थी तभी सुनियोजित योजना के तहत अलीगढ़ कासगंज और कन्नौज में तो गाड़ियां ऐसी भी मिली जो तीनों ही जनपदों में दौड़ी और भुगतान भी ले लिया गया। बहराइच और गोंडा में भी यही खेल खेला गया। 2015-2016 के दौरान इस पूरे घोटाले को अंजाम दिया गया। आरबीएसके योजना के तहत इस वित्तीय वर्ष 43 करोड़ रूपया आया जिसमे से अफसरों ने 40 करोड़ खर्च भी कर दिया। हद तो तब हो गयी जब एनएचएम एमडी आलोक कुमार को जिलों के डीएम ने कोई रिपोर्ट ही नहीं भेजी। सिर्फ चित्रकूट झांसी, पीलीभीत, कानपुर नगर और सीतापुर के डीएम ने ही इस घोटाले पर अपनी रिपोर्ट एमडी को भेजी। इसके बाद अफसरों के मुताबिक कुछ और जिलों से रिपोर्ट आयी है   एमएचएम एमडी ने कई जिलों में हुए इस घोटाले पर अफसरों को वसूली के लिए भी पत्र भेजे। अलीगढ जनपद से करीब 35 लाख, बहराइच से करीब 16 लाख, गोंड़ा से करीब 20 लाख, गोरखपुर से करीब 25 लाख, कन्नौज से करीब 30 लाख और कांशीराम नगर से करीब 31 लाख की वसूली के लिए एमडी ने पत्र भी लिखा। इसी तरह कई जिलों में पत्र भेजे गए। इसके बावजूद न ही कोई वसूली अफसरों से हुई और न ही कार्रवाई। हद तो तब हो गयी जब सहयोगात्मक पर्यवेक्षण योजना के तहत निगरानी और अनुश्रवण के लिए ब्लाॅकों में एक गाड़ी देने की योजना भी करोड़ों के घोटाले के फेर में फंसा दी गयी। इस योजना के तहत दो चरणों में पैसा दिया जाता है पहले चरण में करीब 6 करोड़ जारी किया गया जिसमे आधा पैसा अफसरों ने खर्च कर दिया। दूसरे चरण में 30 करोड़ का बजट जारी किया गया था। जिसमे से अफसरों ने करीब 16 करोड़ खर्च भी कर दिया। करोड़ों के इस घोटाले की गंभीरता को देखते हुए एनएचएम एमडी आलोक कुमार ने शासन को पत्र लिखकर पूरे मामले से अवगत करा दिया और घोटाले में शामिल सीएमओ और एसीएमओ आरबीएसके के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की। साथ ही जिलों के डीएम को भी पत्र भेजकर तत्काल एफआईआर दर्ज कराने की सिफारिश की। इस घोटाले के आरोपी जिलों में बैठे मलाईदार पदों पर बैठकर अभी भी करोड़ों की लूट की इबारत लिख रहे हैं। शासन स्तर पर सक्षम एजेंसी से इस पूरे प्रकरण की जांच कराने को कहा गया था लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई ही शासन ने नहीं की। सिर्फ यही नहीं एनएचएम के तहत हुई चिकित्सा उपकरणों की खरीद में भी करोड़ों के घोटालों को अंजाम दिया गया था बाकायदा एनएचएम के आॅडिट में ये घोटाला बेनकाब भी हुआ बस कार्रवाई के लिए फाइल कभी एनएचएम और कभी स्वास्थ्य महानिदेशालय में अफसरों के चक्कर लगा रही है। इसी तरह डेंगू के लिए आये करोड़ों रुपयों में बंदरबांट को अंजाम दिया गया था। हाईकोर्ट की सख्ती के बावजूद महानिदेशालय स्तर से दोषियों को नोटिस देने के शिवा कोई कार्रवाई नहीं हुई इस लापरवाही के कारण सैकड़ों लोगों की मौत तक हो गयी और आज ऐसे दोषी प्रमोशन पाकर अहम् तैनातियों पर विराजमान है। सेहत महकमे में इसी तर्ज पर कई घोटालों को अंजाम दिया गया है लेकिन कोई भी कार्रवाई न होने से ऐसे घोटालेबाजों के हौसले बेहद बुलंद है योगी सरकार को स्वास्थ्य विभाग में हुए घोटालों की भी सीबीआई जांच करानी चाहिए।